Tuesday, May 28, 2024

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क्रांतिकारियों की माँओं को गुमनामी से निकालकर दुनिया के सामने प्रस्तुत करती पुस्तक ‘बिदाय दे मा’

वैसे तो भारत में वीर प्रसूता माताओं की कमी नहीं है. बहुत से महापुरुषों के बारे में पढ़ा-सुना जाता है कि उनके चरित्र का निर्माण उनकी माताओं ने ही किया है. किंतु देश की आजादी के लिए अपना प्राण न्योछावर कर देने वाले महान सपूतों की माताओं की कहानियों को लेखक सुधीर विद्यार्थी ने ‘बिदाय दे मा!’ नाम की किताब में बहुत ही रोचक तरीके से सहेजा है.

किताब का शीर्षक अपने-आप में बहुत संजीदा है. दरअसल, ये नाम न हो कर शहीद खुदीराम की शहादत पर बांग्ला में गाए जाने वाले एक गीत का अंश है-

” हाँसी- हाँसी चढ़बो फाँसी, देखबे भारतबासी….एक बार बिदाय दे मा घुरे आसी.”

महज 18 साल की उम्र में मां-भारती की आजादी के लिए शहीद होने वाले इस किशोर की अपनी माता बहुत छोटी उम्र में छोड़ कर चली गई थीं. लेकिन शहीद खुदीराम बोस अपनी बड़ी बहन अपरूपा को ही अपनी माता मानते थे. बाद में उन्हें आश्रय देने वाली एक मुस्लिम महिला को भी खुदीराम ने अपनी मां मान लिया. इस महिला ने भी उनसे उसी तरह स्नेह किया. फाँसी की सजा की खबर पाकर बाद वे मिलने के लिए जेल तक आई भी थीं, लेकिन जेल प्रशासन ने उन्हें खुदीराम से मिलने नहीं दिया.

राजपाल एंड संस से प्रकाशित ‘बिदाय दे मा!’ पुस्तक में 12 शहीदों की माताओं की कहानियां संकलित की गई हैं. वैसे तो इसमें तकरीबन सभी कहानियां रोचक और पढ़नीय हैं, लेकिन नेताजी सुभाष चंद बोस और उनकी माता के बीच चिट्ठियों को पढ़ने से नेताजी और उनकी माता के बौद्धिक स्तर का पता चलता है. नेताजी की माता प्रभावती देवी ने बेटे को हर तरह से सुविधाएं देने की कोशिश की तो सुभाष बाबू भी अपने मन में उठने वाले वैचारिक उथल-पुथल को पूरी तरह माता के सामने रखते दिखते हैं. यही नहीं वे देशबंधु चितरंजन दास की माता बासंती देवी को भी अपनी मां की ही तरह मानते थे. उन्होंने बासंती देवी को भी पत्र लिखे हैं.

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‘बिदाय दे मा!’ पुस्तक में लेखक ने अपने शोध से बहुत सारे तथ्यों को जुटाया भी है. उन्होंने कई महान देशभक्तों की शहादत के बाद उनकी माताओं के अभावपूर्ण जीवन पर भी बहुत अच्छे से चर्चा की है. खास तौर से रामप्रसाद बिस्मिल की माता की कहानी का बहुत ही मार्मिक चित्रण किया है. बिस्मिल को फाँसी के बाद उनके छोटे भाई का टीबी से निधन हो गया. पिता भी कुछ समय में चल बसे और माता को बहुत ही अभाव की स्थिति का सामना करना पड़ा.

यहां तक कि शहीदे आजम चंद्रशेखर आजाद की माता जगरानी देवी भी अभाव में जी रही थीं. उस समय के मशहूर लेखक पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी ने माता जगरानी का पता लगाया और उनकी स्थिति के बारे में अखबार में छपवाया. इसके बाद से प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने उनकी आर्थिक मदद की. साथ ही उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सरकारों ने उन्हें पेंशन देना शुरू किया.

‘बिदाय दे मा!’ पुस्तक में जिन अमर शहीदों की माताओं का जिक्र है उनमें रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाकउल्ला खां, शचींद्रनाथ बोस, सुखदेव, मणींद्रनाथ बनर्जी, सोहन सिंह भकना, राजकुमार सिन्हा-विजय कुमार सिंन्हा ( क्रांतिकारी बंधु), प्रताप सिंह बारहठ, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, सुभाषचन्द्र बोस और खुदीराम बोस शामिल हैं. निश्चित ही पु्स्तक पठनीय और संग्रहणीय है.

पुस्तकः बिदाय दे मा!
लेखकः सुधीर विद्यार्थी
प्रकाशकः राजपाल एंड संस

Tags: Books, Hindi Literature, Hindi Writer, Literature, Review

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