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Disturbing Trend: Sc On Exploitation Of ‘silence’ Of Constitution On Appointments Of Ecs, Cecs – सुप्रीम कोर्ट ने कहा: Ec और Cec की नियुक्तियों के लिए 72 साल बाद भी कोई कानून नहीं, उठाया जा रहा है फायदा

Supreme Court
– फोटो : ANI

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सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की चुप्पी का फायदा उठाने और चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्तियों को नियंत्रित करने वाले कानून की गैर-मौजूदगी को परेशान करने वाली प्रवृत्ति करार दिया। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 324 का जिक्र किया जो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के बारे में बात करता है और कहा कि यह ऐसी नियुक्तियों के लिए प्रक्रिया प्रदान नहीं करता है। इसके अलावा, इसने इस संबंध में संसद द्वारा एक कानून बनाने की परिकल्पना की थी, जो पिछले 72 वर्षों में नहीं किया गया है और केंद्र ने इसका दोहन किया है। 

2004 के बाद से किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त ने छह साल का कार्यकाल पूरा नहीं किया
शीर्ष अदालत ने कहा कि 2004 के बाद से किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त ने छह साल का कार्यकाल पूरा नहीं किया है और यूपीए सरकार के 10 साल के शासन के दौरान छह सीईसी थे और एनडीए सरकार के आठ साल में आठ सीईसी हुए हैं। न्यायमूर्ति के एम जोसेफ की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा कि यूपीए सरकार के 10 वर्षों में उनके पास छह सीईसी थे और वर्तमान एनडीए सरकार में लगभग आठ वर्षों में आठ सीईसी रहे। यह एक परेशान करने वाली बात है। इसे लेकर संविधान में कोई संतुलन नहीं है। इस तरह संविधान की चुप्पी का फायदा उठाया जा रहा है। कोई कानून नहीं है और कानूनी तौर पर वे सही माने जा रहे हैं। कानून के अभाव में कुछ भी नहीं किया जा सकता है। 

सीईसी की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम जैसी प्रणाली की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई
शीर्ष अदालत सीईसी की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम जैसी प्रणाली की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। पीठ में जस्टिस अजय रस्तोगी, अनिरुद्ध बोस, हृषिकेश रॉय और सी टी रविकुमार भी शामिल हैं। बेंच ने कहा कि भले ही सीईसी एक संस्था का नेतृत्व करता है, लेकिन अपने छोटे कार्यकाल में वह कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं कर सकता है। 2004 से मुख्य चुनाव आयुक्तों की सूची को देखते हुए उनमें से अधिकांश का कार्यकाल दो वर्ष से अधिक का नहीं है। कानून के अनुसार, उन्होंने छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक का कार्यकाल पूरा किया है। उनमें से ज्यादातर पूर्व नौकरशाह थे और सरकार उनकी उम्र के बारे में जानती थी। उन्हें ऐसे बिंदु पर नियुक्त किया गया था कि वे कभी भी छह साल पूरे नहीं कर पाएं और उनका कार्यकाल छोटा था।  

अटॉर्नी जनरल ने कहा, नियुक्तियों को असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता
केंद्र की ओर से अटॉर्नी जनरल वेंकटरमणि ने कहा कि वर्तमान प्रक्रिया जिसके तहत राष्ट्रपति सीईसी और ईसी की नियुक्ति करते हैं, उसे असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता है और अदालत इसे खत्म नहीं कर सकती है। उन्होंने कहा कि संविधान सभा के पास इससे पहले अलग-अलग मॉडल थे और उसने इस मॉडल को अपनाया था और अब अदालत यह नहीं कह सकती कि वर्तमान मॉडल पर विचार करने की आवश्यकता है। इस संबंध में संविधान का कोई प्रावधान नहीं है जिसकी व्याख्या की आवश्यकता है। जस्टिस जोसेफ ने कहा कि संविधान को बने 72 साल हो गए हैं, लेकिन संविधान में प्रावधान होने के बावजूद चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए अभी तक कोई कानून नहीं है। 

जस्टिस जोसेफ ने कहा, संविधान सभा चाहती थी कि संसद एक कानून बनाए। संविधान को अपनाए हुए 72 साल हो गए हैं लेकिन कोई कानून नहीं है। जो भी पार्टी सत्ता में आएगी वह सत्ता में रहना चाहेगी और इसमें कुछ भी गलत नहीं है। हमारा देश लोकतांत्रिक है। लोकतंत्र को समय-समय पर चुनावों के माध्यम से सरकार में बदलाव की आवश्यकता होती है। इसलिए, शुद्धता और पारदर्शिता बहुत जटिल रूप से जुड़ी हुई है और यह मूल संरचना का भी हिस्सा है।  
  

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की चुप्पी का फायदा उठाने और चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्तियों को नियंत्रित करने वाले कानून की गैर-मौजूदगी को परेशान करने वाली प्रवृत्ति करार दिया। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 324 का जिक्र किया जो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के बारे में बात करता है और कहा कि यह ऐसी नियुक्तियों के लिए प्रक्रिया प्रदान नहीं करता है। इसके अलावा, इसने इस संबंध में संसद द्वारा एक कानून बनाने की परिकल्पना की थी, जो पिछले 72 वर्षों में नहीं किया गया है और केंद्र ने इसका दोहन किया है। 

2004 के बाद से किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त ने छह साल का कार्यकाल पूरा नहीं किया

शीर्ष अदालत ने कहा कि 2004 के बाद से किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त ने छह साल का कार्यकाल पूरा नहीं किया है और यूपीए सरकार के 10 साल के शासन के दौरान छह सीईसी थे और एनडीए सरकार के आठ साल में आठ सीईसी हुए हैं। न्यायमूर्ति के एम जोसेफ की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा कि यूपीए सरकार के 10 वर्षों में उनके पास छह सीईसी थे और वर्तमान एनडीए सरकार में लगभग आठ वर्षों में आठ सीईसी रहे। यह एक परेशान करने वाली बात है। इसे लेकर संविधान में कोई संतुलन नहीं है। इस तरह संविधान की चुप्पी का फायदा उठाया जा रहा है। कोई कानून नहीं है और कानूनी तौर पर वे सही माने जा रहे हैं। कानून के अभाव में कुछ भी नहीं किया जा सकता है। 

सीईसी की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम जैसी प्रणाली की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई

शीर्ष अदालत सीईसी की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम जैसी प्रणाली की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। पीठ में जस्टिस अजय रस्तोगी, अनिरुद्ध बोस, हृषिकेश रॉय और सी टी रविकुमार भी शामिल हैं। बेंच ने कहा कि भले ही सीईसी एक संस्था का नेतृत्व करता है, लेकिन अपने छोटे कार्यकाल में वह कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं कर सकता है। 2004 से मुख्य चुनाव आयुक्तों की सूची को देखते हुए उनमें से अधिकांश का कार्यकाल दो वर्ष से अधिक का नहीं है। कानून के अनुसार, उन्होंने छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक का कार्यकाल पूरा किया है। उनमें से ज्यादातर पूर्व नौकरशाह थे और सरकार उनकी उम्र के बारे में जानती थी। उन्हें ऐसे बिंदु पर नियुक्त किया गया था कि वे कभी भी छह साल पूरे नहीं कर पाएं और उनका कार्यकाल छोटा था।  

अटॉर्नी जनरल ने कहा, नियुक्तियों को असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता

केंद्र की ओर से अटॉर्नी जनरल वेंकटरमणि ने कहा कि वर्तमान प्रक्रिया जिसके तहत राष्ट्रपति सीईसी और ईसी की नियुक्ति करते हैं, उसे असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता है और अदालत इसे खत्म नहीं कर सकती है। उन्होंने कहा कि संविधान सभा के पास इससे पहले अलग-अलग मॉडल थे और उसने इस मॉडल को अपनाया था और अब अदालत यह नहीं कह सकती कि वर्तमान मॉडल पर विचार करने की आवश्यकता है। इस संबंध में संविधान का कोई प्रावधान नहीं है जिसकी व्याख्या की आवश्यकता है। जस्टिस जोसेफ ने कहा कि संविधान को बने 72 साल हो गए हैं, लेकिन संविधान में प्रावधान होने के बावजूद चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए अभी तक कोई कानून नहीं है। 

जस्टिस जोसेफ ने कहा, संविधान सभा चाहती थी कि संसद एक कानून बनाए। संविधान को अपनाए हुए 72 साल हो गए हैं लेकिन कोई कानून नहीं है। जो भी पार्टी सत्ता में आएगी वह सत्ता में रहना चाहेगी और इसमें कुछ भी गलत नहीं है। हमारा देश लोकतांत्रिक है। लोकतंत्र को समय-समय पर चुनावों के माध्यम से सरकार में बदलाव की आवश्यकता होती है। इसलिए, शुद्धता और पारदर्शिता बहुत जटिल रूप से जुड़ी हुई है और यह मूल संरचना का भी हिस्सा है।  

  




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