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Gujarat Election: Politics Broken The Friendship, Friends Become Enemy In Desire Of Ticket From Chhota Udaipur – Gujarat Election: पुत्र मोह में टूटा ‘कांग्रेस परिवार’, इस सीट से टिकट की चाह में दोस्त बने दुश्मन!

Gujarat Election- मोहन सिंह राठवा और नारायण भाई राठवा
– फोटो : Amar Ujala

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गुजरात की आदिवासी बहुल सीट छोटा उदयपुर इस चुनाव में ‘राठवाओं’ का अनोखा मुकाबला देखने के लिए तैयार हो चुकी है। दो राठवाओं की आपसी लड़ाई में कांग्रेस उलझी गई। एक को टिकट मिला, तो दूसरे ने हाथ का साथ छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया। कभी कांग्रेस से टिकट मांगने वाले दोनों राठवा चुनावी मैदान में आमने-सामने हैं। कहानी यहीं पूरी नहीं होती। आम आदमी पार्टी ने भी इसी सरनेम वाले उम्मीदवार पर दांव लगा दिया है। भाजपा की उम्मीदवारी कर रहे राजेंद्र राठवा 10 बार कांग्रेस के विधायक रहे मोहन सिंह भाई राठवा के पुत्र हैं। दरअसल, मोहन भाई अपने पुत्र के लिए कांग्रेस से ही टिकट चाहते थे। कांग्रेस ने मोहन के पुत्र पर भरोसा करने के बजाए राज्यसभा सांसद नारायण भाई राठवा के पुत्र संग्राम को टिकट दे दिया। मोहन सिंह भाई और नारायण भाई राठवा छोटा उदयपुर और पूरे आदिवासी बेल्ट में कांग्रेस के चेहरे ही नहीं, आपस में अच्छे दोस्त के रूप में भी जाने जाते हैं। इस तरह भाजपा और कांग्रेस का चुनावी मुकाबला छोटा उदयपुर में आपस में ही दोस्त रहे राठवाओं के बीच केंद्रित हो गया है। आम आदमी पार्टी ने पेशे से प्रोफेसर अर्जुन राठवा को टिकट दिया है।

आदिवासी बहुल सीट छोटा उदयपुर परंपरागत रूप से कांग्रेस की मानी जाती रही है। 2017 के चुनावों में भाजपा ने संखेड़ा और कांग्रेस ने छोटा उदयपुर और जेतपुर में जीत हासिल की थी। हालांकि 2022 के विधानसभा चुनावों में इन एसटी सीटों पर आदिवासियों के वास्तविक मुद्दे गौण हैं। मोहन राठवा की भाजपा में एंट्री से कार्यकर्ता नाराज हैं। स्थानीय लोग भी भाई-भतीजावाद को लेकर दोनों पार्टियों से नाराज नजर आते हैं। हालांकि अब तक कांग्रेस ने यहां मोहनभाई और नारायण भाई के कारण इस पूरे आदिवासी बेल्ट पर राज किया। इस जोड़ी के टूटने से कांग्रेस की पारंपरिक आदिवासी सीटों पर टूट का असर देखने को मिल सकता है।

पीएम मोदी को एक फोन और बेटे को मिल गया टिकट

कांग्रेस नेता और 10 बार के विधायक 76 वर्षीय मोहन सिंह भाई राठवा ने पुत्र मोह के कारण भगवा धारण कर लिया है। जब अमर उजाला ने उनसे पूछा कि आखिरी वक्त में पार्टी क्यों बदली, तो उन्होंने कहा कि मेरे बेटे राजेंद्र की जगह नारायण के बेटे संग्राम को कांग्रेस ने टिकट दे दिया। इसके बाद मैंने सीधे प्रधानमंत्री मोदी से फोन पर बात की और अपने बेटे के लिए टिकट की मांग की। 24 घंटे के भीतर ही भाजपा ने राजेंद्र को छोटा उदयपुर से भाजपा प्रत्याशी बना दिया। मेरे पीएम मोदी से आज के नहीं वर्षों पुराने संबंध हैं। उनके गुजरात के सीएम रहते मुझे बेस्ट विधायक का पुरस्कार मिला है। वर्षों से विधायक होने के नाते गृहमंत्री शाह से भी मेरे अच्छे संबंध हैं। मैंने दो बार नारायण को सांसद बनाया। आखिर वे मेरा और मेरे बेटे का रास्ता कैसे रोक सकते हैं।  

अमर उजाला से चर्चा में मोहन भाई राठवा कहते हैं कि मैं 10 बार विधायक का चुनाव जीतकर गुजरात विधानसभा पहुंचा हूं। लेकिन इस बार मैंने गुजरात प्रदेश के प्रभारी और प्रदेश अध्यक्ष समेत पार्टी हाईकमान को बात बता दी थी कि यह विधानसभा चुनाव में नहीं लडूंगा। लेकिन इसके बदले में मेरे बेटे राजेंद्र भाई राठवा को टिकट दिया जाए। प्रभारी अशोक गहलोत से इस बारे में बात भी हुई, उन्होंने आश्वस्त किया था कि टिकट की चिंता मत कीजिए। हम आखिरी दिन तक पार्टी के फैसले का इंतजार करते रहे, लेकिन जब टिकट नहीं मिला, तो मैंने पार्टी छोड़ने का निर्णय लिया। जहां तक मेरे पुराने कांग्रेसी साथियों के बात है, तो मैं अब तक 100 से ज्यादा कांग्रेस कार्यकर्ताओं को भाजपा में शामिल करवा चुका हूं। भाजपा कार्यकर्ताओं की मेरे प्रति नाराजगी की कोई बात नहीं है। हम सब मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं।

नारायण ने एक टिकट के पीछे दोस्ती दांव पर लगा दी

मोहन भाई राठवा कहते हैं कि कांग्रेस नेता नारायण भाई राठवा को मैं ही राजनीति में लेकर आया। उन्हें पांच बार लोकसभा चुनाव भी मैंने ही लड़वाया। एक बार उन्हें केंद्र में मंत्री बनाने के लिए कांग्रेस हाईकमान सिफारिश भी की। ताकि क्षेत्र का विकास हो सके। मैंने अपने बेटे राजेंद्र के टिकट के लिए उन्हें एक साल पहले ही बोल दिया था। इसके बाद भी उन्होंने हाईकमान को गुमराह किया और अपने बेटे संग्राम के लिए टिकट ले आए। नारायण भाई और उनके परिवार से वर्षों पुराने दोस्ताना संबंध हैं। लेकिन एक टिकट के पीछे उन्होंने वर्षों पुरानी दोस्ती दांव पर लगा दी।

राठवा कांग्रेस पार्टी पर तंज कसते हुए कहते हैं कि कांग्रेस पार्टी अपने ही उदयपुर संकल्प शिविर को भूल गई। राज्यसभा सांसद रहते हुए नारायण भाई राठवा के बेटे संग्राम को टिकट दे दिया। जबकि मैंने साफ कहा था कि मैं चुनाव नहीं लडूंगा। मेरा बेटा राजेंद्र दावेदारी करेगा। इसके बाद भी हाईकमान और गुजरात के नेताओं ने मुझे नजरअंदाज कर दिया। दोस्ती टूटने के सवाल पर मोहन राठवा कहते हैं कि मेरे घर पर उनका आना-जाना लगा रहता था। लेकिन पिछले सात माह से वह मुझसे मिलने तक नहीं आए। गुजरात कांग्रेस नेताओं के साथ होने वाली बैठकों में भी मुझसे किनारा करते थे। अब भविष्य में मैं तो उनसे मिलने जाऊंगा नहीं। लेकिन अगर छोटे भाई के नाते वे मेरे घर आते हैं तो हमेशा स्वागत है।

बेटे को लोकसभा सीट से लड़ाने का हुआ था वादा

इधर, अमर उजाला से चर्चा में कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद नारायण भाई राठवा कहते हैं कि टिकट का फैसला करना हाईकमान का काम है। मैं अभी राज्यसभा सांसद हूं अगले वर्ष मेरा कार्यकाल खत्म होने जा रहा है। 69 साल का हो गया है। मैं तय किया है कि भविष्य में कोई चुनाव नहीं लडूंगा। अब क्षेत्र की कमान युवाओं के हाथ सौंपने का मौका है। जहां तक बात मोहन भाई के बेटे के टिकट की है, तो उन्हें पार्टी और हमने वचन दिया था कि 2024 में छोटा उदयपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस का प्रत्याशी उनका बेटा राजेंद्र रठावा ही होगा। हम उसे जिताने के लिए काम करेंगे। लेकिन वह माने नहीं और उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया। जहां तक भविष्य में फिर से बात करने की बात है, तो चुनाव में जीत हार के बाद आगे के रिश्तों के बारे में सोचेंगे।

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गुजरात की आदिवासी बहुल सीट छोटा उदयपुर इस चुनाव में ‘राठवाओं’ का अनोखा मुकाबला देखने के लिए तैयार हो चुकी है। दो राठवाओं की आपसी लड़ाई में कांग्रेस उलझी गई। एक को टिकट मिला, तो दूसरे ने हाथ का साथ छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया। कभी कांग्रेस से टिकट मांगने वाले दोनों राठवा चुनावी मैदान में आमने-सामने हैं। कहानी यहीं पूरी नहीं होती। आम आदमी पार्टी ने भी इसी सरनेम वाले उम्मीदवार पर दांव लगा दिया है। भाजपा की उम्मीदवारी कर रहे राजेंद्र राठवा 10 बार कांग्रेस के विधायक रहे मोहन सिंह भाई राठवा के पुत्र हैं। दरअसल, मोहन भाई अपने पुत्र के लिए कांग्रेस से ही टिकट चाहते थे। कांग्रेस ने मोहन के पुत्र पर भरोसा करने के बजाए राज्यसभा सांसद नारायण भाई राठवा के पुत्र संग्राम को टिकट दे दिया। मोहन सिंह भाई और नारायण भाई राठवा छोटा उदयपुर और पूरे आदिवासी बेल्ट में कांग्रेस के चेहरे ही नहीं, आपस में अच्छे दोस्त के रूप में भी जाने जाते हैं। इस तरह भाजपा और कांग्रेस का चुनावी मुकाबला छोटा उदयपुर में आपस में ही दोस्त रहे राठवाओं के बीच केंद्रित हो गया है। आम आदमी पार्टी ने पेशे से प्रोफेसर अर्जुन राठवा को टिकट दिया है।

आदिवासी बहुल सीट छोटा उदयपुर परंपरागत रूप से कांग्रेस की मानी जाती रही है। 2017 के चुनावों में भाजपा ने संखेड़ा और कांग्रेस ने छोटा उदयपुर और जेतपुर में जीत हासिल की थी। हालांकि 2022 के विधानसभा चुनावों में इन एसटी सीटों पर आदिवासियों के वास्तविक मुद्दे गौण हैं। मोहन राठवा की भाजपा में एंट्री से कार्यकर्ता नाराज हैं। स्थानीय लोग भी भाई-भतीजावाद को लेकर दोनों पार्टियों से नाराज नजर आते हैं। हालांकि अब तक कांग्रेस ने यहां मोहनभाई और नारायण भाई के कारण इस पूरे आदिवासी बेल्ट पर राज किया। इस जोड़ी के टूटने से कांग्रेस की पारंपरिक आदिवासी सीटों पर टूट का असर देखने को मिल सकता है।

पीएम मोदी को एक फोन और बेटे को मिल गया टिकट

कांग्रेस नेता और 10 बार के विधायक 76 वर्षीय मोहन सिंह भाई राठवा ने पुत्र मोह के कारण भगवा धारण कर लिया है। जब अमर उजाला ने उनसे पूछा कि आखिरी वक्त में पार्टी क्यों बदली, तो उन्होंने कहा कि मेरे बेटे राजेंद्र की जगह नारायण के बेटे संग्राम को कांग्रेस ने टिकट दे दिया। इसके बाद मैंने सीधे प्रधानमंत्री मोदी से फोन पर बात की और अपने बेटे के लिए टिकट की मांग की। 24 घंटे के भीतर ही भाजपा ने राजेंद्र को छोटा उदयपुर से भाजपा प्रत्याशी बना दिया। मेरे पीएम मोदी से आज के नहीं वर्षों पुराने संबंध हैं। उनके गुजरात के सीएम रहते मुझे बेस्ट विधायक का पुरस्कार मिला है। वर्षों से विधायक होने के नाते गृहमंत्री शाह से भी मेरे अच्छे संबंध हैं। मैंने दो बार नारायण को सांसद बनाया। आखिर वे मेरा और मेरे बेटे का रास्ता कैसे रोक सकते हैं।  

अमर उजाला से चर्चा में मोहन भाई राठवा कहते हैं कि मैं 10 बार विधायक का चुनाव जीतकर गुजरात विधानसभा पहुंचा हूं। लेकिन इस बार मैंने गुजरात प्रदेश के प्रभारी और प्रदेश अध्यक्ष समेत पार्टी हाईकमान को बात बता दी थी कि यह विधानसभा चुनाव में नहीं लडूंगा। लेकिन इसके बदले में मेरे बेटे राजेंद्र भाई राठवा को टिकट दिया जाए। प्रभारी अशोक गहलोत से इस बारे में बात भी हुई, उन्होंने आश्वस्त किया था कि टिकट की चिंता मत कीजिए। हम आखिरी दिन तक पार्टी के फैसले का इंतजार करते रहे, लेकिन जब टिकट नहीं मिला, तो मैंने पार्टी छोड़ने का निर्णय लिया। जहां तक मेरे पुराने कांग्रेसी साथियों के बात है, तो मैं अब तक 100 से ज्यादा कांग्रेस कार्यकर्ताओं को भाजपा में शामिल करवा चुका हूं। भाजपा कार्यकर्ताओं की मेरे प्रति नाराजगी की कोई बात नहीं है। हम सब मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं।




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